शिव भक्त नहीं था Rawan, सिर्फ वरदान के लिए करता था उपासना! जैसे ऐसे ही कुछ Facts :- सीता हरण के आलावा हजारो अप्सराओ, गन्धर्व कन्याओ और राक्षसियो तक के बलात्कार करने वाले रावण को आज भी कई लोग सम्मान की नजरो से देखते है. कोई कोई उसे ब्राह्मण कह के दशहरे के दिन उसके दहन का भी हलकी आवाज में विरोध करते है.

ठीक है लोकतंत्र है, इसमें सभी को अपनी बात कहने का हक़ है लेकिन क्या ऐसा करने हम/आप भारत की आत्मा श्रीराम पर ही तो सवालिया निशान नहीं उठा रहे है. ज्ञान होना अलग चीज है लेकिन लोक कल्याण में उसका उपयोग मायने रखा है, परकाण्ड पंडित कह कर उसके द्वारा किये गए कुकृत्यों पर पर्दा तो नहीं डाला जा सकता है.

शिव तांडव स्त्रोत्र समेत कई संस्कृत रचनाये रावण ने रची थी लेकिन इसका ये मतलब नहीं है की रावण शिव का भक्त था! जब रावण को अपनी शक्ति का घमंड हुआ तो उसने क्रोध में हिमालय को ही उठा लिया था वो भी उस समय जब शिव और पार्वती वंहा विराजमान थे.

तब शिव ने रावण को अपने पेअर के अंगूठे से दबा दिया था, मरता क्या न करता तब रावण ने बुद्धि का प्रयोग कर रचा था “शिव तांडव स्त्रोत्र”…

शिव भक्त नहीं था Rawan, सिर्फ वरदान के लिए करता था उपासना! जैसे ऐसे ही कुछ Facts....
शिव भक्त नहीं था Rawan, सिर्फ वरदान के लिए करता था उपासना! जैसे ऐसे ही कुछ Facts….

image sources: news75

तब भी शिव ने उसे माफ़ नहीं किया था, लगातार 3000 वर्षो तक जब रावण ने इस मन्त्र से शिव स्तुति की तब जाकर शिव उसपे प्रसन्न हुए और वरदान भी दिए. अब बताइये इसमें कहा उसकी शिव भक्ति दिखती है बल्कि ये तो बुद्धि से समस्या से बचने की कला है वो भी अपने घमंड से पैदा हुई समस्या थी.

रावण युद्ध में अजेय होने के लिए लंका में कात्यायनी देवी की श्राद्धीय पूजा करता था (नवरात्र) जो उसे शक्ति प्रदान करता था लेकिन राम जी ने अमावस्या से ही शक्ति पूजा शुरू कर वरदान ले लिया था रावण वध का.

image sources: punjabkesari

ऐसे ही रावण ने ज्योतिष का ज्ञाता होने के चलते नवग्रहों को अपने वश में कर लिया था लेकिन शनि नहीं माना था, तब रावण ने उसे लंका में कैद में उलटा टांग दिया था जिन्हे हनुमान ने मुक्त करवाया था.

सीधा सीधा मतलब ये है की त्रिलोकी को जितने और अपने वश में करने के लिए वो शिव हो या दुर्गा हो या नवग्रह हो या ब्रह्मा सभी की उपासना किया करता था. भक्ति तो व्यक्ति को दया सिखाती है, क्या आपने किसी भी भक्त को हिंसा करते हुए सुना है है कोई उदहारण?

रावण भक्ति नहीं बल्कि एक चतुर राक्षस था, ब्रम्हा के अण यानि की ब्राह्मण तो सभी है लेकिन कर्मो से ब्राह्मण हो वो ही ब्राह्मण है जन्म से धर्म या वर्ण का कोई लेना देना नहीं है. स्वाभाव ही व्यक्ति को मनुष्य या राक्षस बनाते है राक्षस भी तो मनुष्य ही थे बस गुणों का अंतर था.